24 May 2005

क्षणिकाएँ-4

  • लकीरें
लक्षमण रेखा से
रेखाओं का सिलसिला
आज तक
चला आ रहा है,
गरीबी रेखा से
गरीब,
बाहर ही नहीं आ रहा है !

***

  • धरातल

आदमी के
आंकलन का पैमाना
आज,
यूँ चलता है,
बड़ा वो है
जो ज़मीन पर नहीं,
पर्दे पर चलता है !
***



  • साधना

कड़ी मेहनत और
साधना में ढली
जेम्सवॉट की भाप को
बच्चों का खेल
मत बनाओ,
एक के पीछे एक आओ
रेल बनाओ, रेल बनाओ !
***

-रमेश कुमार भद्रावले

1 Comments:

At 23 July, 2005, Anonymous Anonymous said...

अगर आप अपनी कविताओं के साथ चित्र भी लगा दें तो इनका महत्व बढ़ जाएगा।
-मदन मोहन उपेन्द्र, संपादक सम्यक

 

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